A streetplay

Here is a street play on women empowerment written by me and improvised by Rashmi on 15th Sept. 2006.

Jhoti

औरत-            मैं हूँ एक कमजोर नारी, अपनी ही किशमत से हारी.

भूक और ग़रीबी की मारी, एक्दुम अकेली, बेसहारा, बेचारी.

 

ग़रीबी-            हा हा हा!

तेरी हर ख्वाब को मैं तोड़ जाउँगा.

तेरी हर ख्वाइश की मे आरती निकालूँगा.

मुझसे बचके तू कहाँ जाएगी;

मैं हूँ ग़रीबी;

तुझे जीवन् भर सताउँगा, तडपाउँगा! हा हा हा!

 

समाज-           मैं समाज. मर्द मेरे श्रीष्टि-करता; मेरे पुजारी है.

मेरे बनाए हर नियम को मानना; तेरे लिए ज़रूरी है.

भूल से भी कभी मुझसे बग़ावत ना करना;

क्यो के मेरे ही हाथों मे तेरी किश्मत की डोरी है.

 

दहेज-            तू अगर सीता है तो मैं रावण हूँ.

तेरी सबसे बड़ी खुशी मे, मैं उलझन हूँ.

तुझे और तेरी परिबर को मैं बर्बाद कर सकता हूँ.

मैं दहेज; तेरी सबसे बड़ी दुश्मन हूँ.

 

मर्द-              मैं मर्द हूँ; तू मेरे पैरों की जूती है.

मैं भगवान हूँ तेरा; मेरे आगे क्या तेरी हस्ती है?

तुझे मैं अपनी बराबरी का दर्जा दे नही सकता;

तू औरत है; मेरे पावं की धूल मे ही तेरी मुक्ति है.

 

औरत-         क्या यहाँ, ऐसा कोई नही; जो मेरा साथ दे सके;

मैं अकेली, इतने सारे भेड़िए; इनके चंगुल से जो मुझे बचा सके!

 

समाज, मर्द, दहेज, ग़रीबी-        हा हा हा!

 

शिक्षा-           रो मत मेरी बची; आ मेरा हाथ थाम.

मैं तुझे इनसे बचाउँगा.

मैं हूँ शिक्षा, तेरा भाई,

तेरी राखी की लाज़ निभाउँगा.

 

ग़रीबी-          हा. मेरे होते हुए, तू पाठ कैसे पढ़ पाएगी.

इस रखी के लिए, तू धन कहाँ से लाएगी?

 

शिक्षा-          सरकार की योजना, तुझको धूल चखाएगी.

धन की ज़रूरत नही, वो मुफ़्त ही पढ़ पाएगी.

 

समाज-        रे मूर्ख नारी; तू किसके कहे आती है?

इस अद्दने से भाई के लिए, मुझे ललकारती है.

छोड़ दे पढ़ाई, चूल्हा चौका संभाल,

शायद मैं तुझे माफ़ कर जाउँगा!

वरना, अपने क्रोध के ज्वाला मे,

तुझे भस्म मे कर जाउँगा.

 

औरत-         दोगलापन तुझसे, मैने कभी सीखी नही;

हाथ पकड़कर छोड़ना मैने कभी सीखा नही.

साथ अपने भाई का मैं उमर भर निभाउंगी,

याद रख, जब पढ़ाई होगी पूरी; मैं तुझे ही बदल डालूंगी.

 

दहेज-         तू चाहे कितना भी पढ़ले; मुझसे कैसे बच पाएगी?

मारी माँग पूरा किया बैगेर; अपनी माँग कैसे सजाएगी?

 

शिक्षा-        तू वो गंदा कीड़ा है; जिसे मे पल मे मसल डालूँगा;

तेरा नाम भी गर कोई लेगा; उसे मे जैल की हवा खिलाऊँगा.

 

मर्द-           मैं शोला हूँ;

मेरे पास आई तो जल जाएगी.

मुझसे टकराएगी तो तेरा वजूद भी खो जाएगी.

मैं अपनी अहम को ठेस पहुँचते देख नही सकता;

तू औरत जात, मेरी बराबरी करेगी?

यह मैं बर्दास्त कर नही सकता!

 

औरत-      तेरे अहम को तो मैं मिट्टी मे मिलादूँगी.

तेरी बराबरी नही, तुझ पर मे हुकुम चलाउंगी.

औरत को पैरों की जुटी मानने वाले

तुझे ऐसा सबक सीखाउंगी.

शिक्षा की ताक़त के दम पे;

तुझे मर्द से नामर्द बनाउंगी.

 

शिक्षा-      ए मेरी प्यारी बेहेना;

मैं तेरा व्याह रचाउँगा.

यह है “खुस-हाल ज़िंदगी”

इसे मे तेरा दूल्हा बनाउँगा.

बाद शादी के मुझे भूल ना जाना ए बेहेना

अपनी हर पीढ़ी को मुझ जैसा भाई तोहफे मे देना.

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